19 Aug 2017, 20:18 HRS IST
  • मासोन: रूस की स्वेतलाना कुज्नेत्सोवा रिवर्स शॉट लगाती हुई
    मासोन: रूस की स्वेतलाना कुज्नेत्सोवा रिवर्स शॉट लगाती हुई
    कोलकाता: सतरंगी छाते की छांव में ग्राहकों का इंतजार करती फल विक्रेता
    कोलकाता: सतरंगी छाते की छांव में ग्राहकों का इंतजार करती फल विक्रेता
    दिल्ली: उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू को गुलदस्ता भेंट करते किरेन रिजीजू
    दिल्ली: उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू को गुलदस्ता भेंट करते किरेन रिजीजू
    मुंबई: लैक्मे फैशन वीक—2017 में प्रदर्शन के दौरान अभिनेत्री दिया मिर्जा
    मुंबई: लैक्मे फैशन वीक—2017 में प्रदर्शन के दौरान अभिनेत्री दिया मिर्जा
PTI
PTI
Select
खबर
Skip Navigation Linksहोम मुलाकात
login
  • सबस्क्राइबर
  • यूज़र नाम
  • पासवर्ड   
  • याद रखें
ad
    • मुलाकात
    • रेटिंग   Rating Rating Rating Rating Rating
  •  
  • भाषा का कोई धर्म नहीं होता
  • [ - ] आकार [ + ]
  • .                                                  अहमद नोमान

    नयी दिल्ली, 11 नवंबर,:भाषा: उर्दू जबान की तरक्की के लिए फिक्रमंद साहित्यकारों और शिक्षाविदों का मानना है कि इस भाषा को सिर्फ मुसलमानों की जबान के तौर पर पेश कर एक दायरे में सीमित करने की कोशिशें की जा रही हैं जबकि असलियत यह है कि यह पूरे देश में और विभिन्न समुदायों में बोली जाती है और इसके विकास में सभी का अहम योगदान है । इसके अलावा उर्दू और हिन्दी छोटी और बड़ी बहने हैं और इनमें आपस में कोई टकराव नहीं है।साहित्य अकादमी के उर्दू सलाहकार बोर्ड के संयोजक और इसके कार्यकारी बोर्ड के सदस्य चंद्रभान ‘ख्याल’ ने कहा कि साजिशन उर्दू को मुसलमानों की भाषा बताकर इसका दायर सिमटाया जा रहा है लेकिन इस जबान का भविष्य उज्ज्वल है क्योंकि यह समूचे देश में बोली और पसंद की जाती है।जोधपुर के मौलाना आजाद विश्वविद्यालय के कुलपति और भाषाई अल्पसंख्यक मामलों के पूर्व आयुक्त प्रो अख्तर उल वासे ने कहा कि उर्दू और हिन्दी को एक दूसरे का विरोधी बनाने की कोशिश की गई लेकिन इन दोनों ही भाषाओं के जनक अमीर खुसरो थे और इसे हजरत निजामुद्दीन औलिया का संरक्षण भी मिला।उर्दू के विकास के लिए प्रयासरत संगठन उर्दू डेवलपमेंट आर्गेनाइजेशन हर साल नोै नवंबर को उर्दू दिवस का आयोजन करता आ रहा है और यह 1997 से अब तक जारी है।चंद्रभान ख्याल ने ‘भाषा’ से खास बातचीत में कहा कि उर्दू दुनिया की तीसरी बड़ी जबान है।हिन्दुस्तान में भी इसका बोलबाला है। हालांकि राजनीतिक दल सियासी फायदे के लिए उर्दू का इस्तेमाल कर रहे हैं। उर्दू का मिजाज पूरी तरह से सेकूलर है जब से उर्दू जबान पैदा हुई है तब से ही हिन्दू, मुस्लिम सिख और ईसाई सभी समुदायों के लोगों ने इसका संवर्धन किया है और इसके साहित्य में सभी का बहुत योगदान रहा है। उन्होंने कहा कि दिलचस्प बात यह है कि विभिन्न विश्वविद्यालयों और अकादमियों के उर्दू सिखाने वाले कोर्सों में 90 फीसदी छात्र गैर मुस्लिम होते हैं।इस बात पर जोर देते हुए कि धर्म की कोई भाषा नहीं होती है बल्कि धर्म को भाषाओं की जरूरत होती है ,प्रो वासे ने कहा कि उर्दू और हिन्दी को एक दूसरे का विरोधी बनाने की कोशिश की गई। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि असगर वजाहत और बिस्मिल्लाह खान के बिना हिन्दी साहित्य में अधूरापन दिखता है वैसे ही गोपीचंद नारंग, रघुपति सहाय फिराक , और राजेंद्र सूरी के बिना उर्दू साहित्य की कल्पना नहीं की जा सकती।प्रो वासे ने कहा कि भाषाएं सरकार के संरक्षण में नहीं पनपती बल्कि भाषाओं के बोलने वालों और जगह का महत्व होता है। उर्दू को मुसलमानों से जोड़ने पर दिल्ली विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग के प्रमुख प्रो इब्ने कंवल ने कहा कि चूंकि उर्दू की लिपी अरबी फारसी से मिलती है इसलिए इसे मुसलमानों की भाषा कहा जाने लगा।उन्होंने सवाल किया कि उर्दू कैसे मुसलमानों की भाषा है? क्या पैगंबर मोहम्मद उर्दू जानते थे? दक्षिण भारत में रहने वाले मुसलमान क्या उर्दू जानते हैं? उन्होंने कहा कि भाषा मजहब की नहीं जगह या मुल्क और उसके बोलने वालों की होती है।कंवल ने कहा कि 20-25 साल पहले उर्दू की जो हालत थी उससे आज इसकी स्थिति बेहतर है। पहले एमए में 20-25 छात्र होते थे वहीं आज हर सेक्शन में 60-70 विद्यार्थी होते हैं। पहले पीएचडी के लिए 10-12 आवेदन आते थे और आज कम से कम 150 आते हैं।प्रो वासे ने कहा कि 21 वीं सदी में हम यह देख रहे हैं कि उर्दू को एक नया आयाम मिला रहा है और उर्दू के पांच चैनल हैं जिनमें से सिर्फ एक का मालिकाना हक मुस्लिम के पास है। अगर उर्दू के दर्शक नहीं होते तो यह चैनल भी नहीं होते क्योंकि कारपोरेट घाटे का सौदा नहीं करता है। उर्दू डेवलपमेंट...

रेट दें
Submit
  • इस मुलाकात पर अपनी राय दें
  • अन्य मुलाकात
  •     
add