31 Mar 2020, 13:27 HRS IST
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  • शाकाहारी भोजन की पहचान बन रहे हैं मेनारिया रसोइये
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    जयपुर, 13 जनवरी :भाषा: राजस्थान में उदयपुर के मेनार और उसके आसपास के गांव कलवल, करजाली, बाठेड़ा खुर्द, खरसान, रुंडेडा, इंटाली, बाँसड़ा गाव के 'मेनारिया ब्राह्मण समुदाय' की दो पीढ़ियां शाकाहारी खाना बनाने में ना केवल देश में बल्कि विदेश में भी अपने समाज, राज्य और देश का नाम रोशन कर रही हैं। 
    मेनारिया समाज के करजाली निवासी रसोइये मांगीलाल मेनारिया को हाल ही में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की, जापान की राजधानी तोक्यो की यात्रा के दौरान भोजन की व्यवस्था की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। मांगीलाल तोक्यो के एक होटल में शेफ हैं। 
    मांगीलाल ने मुंबई के विले पार्ले स्थिल हीना ट्यूर एंड ट्रैवल से बतौर शेफ अपने करियर की शुरूआत की थी। इस कंपनी के मालिक प्रभुलाल जोशी ने 'भाषा' को बताया कि उनके यहां चित्तौड़गढ़, नाथद्वारा, मेनार के करीब 400 लोग काम कर रहे हैं। ‘‘हमारे यहां रसोइये को लज़ीज़ शुद्व शाकाहारी खाना बनाने का प्रशिक्षण उदयपुर के डबोक में दिया जाता है। प्रशिक्षण के बाद परीक्षा ली जाती है जिसमें पास होने वालों को आगे की तैयारी कराई जाती है।’’ 
    उन्होंने बताया ‘'हम ताजा शुद्व शाकाहारी भोजन परोसते हैं। यूरोप में हम किचन केयर वैन चलाते हैं। मिनी बस जैसी किचन केयर वैन में खाने की पूरी व्यवस्था होती है और किसी भी होटल का डाइनिंग हाल बुक कर हमारी किचन केयर वैन में बनाया गया खाना परोसा जाता है।’’ 
    35 वर्षों से इस कार्य में लगे जोशी ने बताया कि मुंबई की पुरानी मिलों के मालिकों, अडाणी, अंबानी जैसे कारोबारी दिग्गजों के घरों में भी मेनारिया रसोइये काम कर चुके हैं।
    67 वर्षीय जोशी ने बताया कि उदयपुर—चित्तोड़गढ़ राजमार्ग पर स्थित मेनार गांव की आबादी करीब 10 हजार है। गांव में कई रसोइये अब उम्र बढ़ने की वजह से खुद काम छोड़ कर अपने बेटों को पाक कला में सिद्धहस्त बना चुके हैं। कम पढे़ लिखे युवा भी इस धंधे में अच्छा पैसा कमा लेते हैं। 
    उन्होंने बताया ’’देश विदेश में लजीज शाकाहारी खाना बनाने में हमारे समाज की मोनोपॅली है। मेनारिया समाज के रसोइये भारत, भूटान, नेपाल के साथ साथ अन्य देशों में भी स्वादिष्ट भारतीय भोजन पका रहे हैं। समाज के करीब 50 रसोइये हमारी कंपनी में हैं और कई अन्य फ्री लॉन्सर भी हैं।’’ 
    मेनार गांव के निवासी उमेश पुंडरोत ने बताया कि उनके गांव के रहने वाले पूनमचंद प्राथमिक कक्षाओं के बाद कभी विद्यालय नहीं गए बल्कि रसोइये का पेशा अपना लिया। 

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