16 Oct 2019, 08:6 HRS IST
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  • पांच अगस्त तक हो जायेगी मानसून में बारिश की कमी की भरपायी : : डा. रंजीत सिंह
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  •  नयी दिल्ली, 28 जुलाई (भाषा) मौसम विभाग के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. रंजीत सिंह का मानना है कि पिछले कुछ दिनों में मानसून की सक्रियता ने देश में बारिश की कमी के स्तर को कम किया है और पांच अगस्त तक इसकी काफी हद तक भरपायी होने की उम्मीद है। 
    मानसून की अनियमित गति पर डा. सिंह से भाषा के पांच सवाल और उनके जवाब : सवाल : इस मानसून में बारिश की कमी का स्तर पूरे देश में 17 प्रतिशत तक पहुंच गया है। मानसून की गति को देखते हुये इसकी भरपायी की क्या कोई उम्मीद है? जवाब: इस सप्ताह के शुरु में दक्षिण पश्चिम मानसून की बारिश में कमी का देशव्यापी स्तर 19 प्रतिशत था जो कि शनिवार को घटकर 14 प्रतिशत रह गया है। जून में मानसून सक्रिय होने के बाद बारिश की कमी का स्तर 33 प्रतिशत था। लेकिन यह कमी लगातार घट रही है। यह मानसून की शुरुआती सक्रियता में कमी के कारण हुआ है। यह सही है कि पिछले सालों की तुलना में मानसून के सक्रिय होने की गति इस साल थोड़ी धीमी रही। इसके कारण बारिश में कमी दर्ज की गयी है लेकिन पिछले एक सप्ताह से लेकर अगले एक सप्ताह तक मानसून की सक्रियता, बारिश की कमी को पूरा कर देगी। सवाल: उत्तर भारत में मानसून के बिखराव की स्थिति में इस साल इजाफा होने के कारण कहीं बारिश तो कहीं सूखा है और इससे उमस भरी गर्मी ने परेशानी बढ़ा दी है। इसकी क्या वजह है? जवाब: वैसे तो मौसम संबंधी गतिविधियों के लिहाज से देखें तो यह बहुत असामान्य नहीं है। मौसम विज्ञान में इसे जलवायु के उतार चढ़ाव के रूप में देखा जाता है। इसके अंतर्गत भारत में पिछले एक दशक से बारिश की पूर्ति की नकारात्मकता का दौर चल रहा है। जिसकी वजह से मानसून के वितरण में असमानता की प्रवृत्ति के कारण एक ही इलाके में कहीं ज्यादा बारिश होती है, कहीं बिल्कुल भी नहीं। स्थान विशेष पर हवा के कम दबाव का पर्याप्त क्षेत्र नहीं बन पाने के कारण बादल तो घिर जाते हैं लेकिन बारिश नहीं होती। बारिश नहीं होने से तापमान में जरूरी गिरावट नहीं आ पाने से उमस बढ़ती है। यह स्थिति इस साल उत्तरी क्षेत्र में कुछ ज्यादा देखने को मिली। हालांकि इससे अब राहत मिल जायेगी। सवाल : साल दर साल मानसून के बढ़ते असमान वितरण की क्या वजह है? जवाब: विश्व मौसम संगठन ने हाल ही में मौसम की अतिवादी गतिविधियों (एक्सट्रीम इवेंट) का वैश्विक अध्ययन किया था। दुनिया भर में भीषण गर्मी, भयंकर सर्दी और अतिवृष्टि जैसी मौसम की अतिवादी गतिविधियों के पिछले 50 सालों के आंकड़ों के आधार पर यह कहा जा सकता है वैश्विक स्तर पर एक्सट्रीम इवेंट की संख्या बढ़ रही है। इसकी एक संभावित वजह जलवायु परिवर्तन को माना जा सकता है। इसमें गर्मी, सर्दी और बरसात के मौसम का लंबा चलना और मानसून का असमान वितरण भी शामिल है। भारत में भी पिछले दो सालों में गर्मी और सर्दी लंबे समय तक चलने के कारण पिछले साल मानसून की वापसी भी देर से हुयी थी। इस साल भी इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है।
    सवाल: मानसून के असमान वितरण के कारण महाराष्ट्र और पड़ोसी राज्यों के कुछ जिलों में मौसम विभाग ने कृत्रिम बारिश कराने का फैसला किया है। क्या यह स्थिति उत्तर प्रदेश और राजस्थान के सूखे इलाकों के लिये भी हो सकती है? जवाब: कृत्रिम बारिश का फैसला संबद्ध राज्य सरकार करती है। इसमें मौसम विभाग सिर्फ तकनीकी मदद मुहैया कराता है। महाराष्ट्र एवं पड़ोसी इलाके के सूखा प्रभावित लगभग दो दर्जन जिलों में विभाग के पूना शोध केन्द्र की मदद से कृत्रिम बारिश की पहल की गयी है। मानसून की संभावित गति को देखते हुये उत्तर प्रदेश और राजस्थान के सूखा प्रभावित इलाकों में कृत्रिम बारिश कराने की कोई जरूरत नहीं होनी चाहिये। वैसे भी यह बहुत लाभप्रद और कारगर तरीका नहीं है। इसे कृषि के अवश्यंभावी नुकसान को देखते हुये अपनाया जाता है। कृत्रिम बारिश से खेती के नुकसान की जितनी मात्रा की भरपाई होती है उससे ज्यादा कृत्रिम बारिश पर खर्च हो जाता है। इसलिये यह लाभ का सौदा नहीं है। सवाल : मानसून के मौजूदा मिजाज को देखते हुये क्या उत्तरी क्षेत्र में बारिश को लेकर कोई राहत की उम्मीद की जा सकती है? जवाब: पिछले एक सप्ताह से...

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