22 Sep 2019, 05:5 HRS IST
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  • असीम : जिसे एक वक्त कैमरा छूने की इजाजत नहीं थी
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  •                                                    : राजेश अभय :

    नयी दिल्ली, 19 अगस्त :भाषा: एक वक्त था जब उसे ‘स्टिल कैमरा’ छूने तक की इजाजत नहीं थी लेकिन आज वही शख्स अपने कैमरे के जादू से बालीवुड को मंत्रमुग्ध किये है और लाखों सिने दर्शकों के दिलों पर राज कर रहा है।आज आलम यह है कि हर बड़ा फिल्म निर्देशक इस कैमरामैन को अपनी फिल्मों के फिल्मांकन के लिए अपने साथ रखना चाहता है। हालिया रिलीज हुई कबीर खान के निर्देशन में सलमान और कैटरीना कैफ द्वारा अभिनीत फिल्म ‘एक था टाईगर’ के कैमरामैन असीम मिश्रा ने कहा, ‘‘आज बेशक मुंबई में लोग कैमरा के काम के लिए मुझे जानते हैं लेकिन एक समय था जब मेरे पिता स्थिर चित्रों के छायांकन के समय सिर्फ ‘स्टिल कैमरा’ के चमड़े का कवर तक ही हाथ में पकड़कर रखने की अनुमति देते थे और कैमरा छूने की कतई इजाजत नहीं थी।’’ असीम ने ‘भाषा’ को बताया, ‘‘मेरे पिता धनबाद में खान सुरक्षा विभाग में अधिकारी थे और उन्हें ‘स्टिल फोटोग्राफी’ का शौक था लेकिन हम सभी को साफ कहा गया था कि कैमरा काफी महंगी चीज है और इसको छूने से यह खराब हो सकता है। मेरे जिद करने पर ज्यादा से ज्यादा मुझे कैमरे के चमड़े का कवर थमा दिया जाता था और मैं उस कवर को पकड़ के ही कुछ अलग अनुभव करता था।’’ एक मजेदार बात यह है कि असीम ने जितनी भी फिल्मों के लिए कैमरा का काम किया उसे दर्शकों की भरपूर सराहना मिली और उनकी इन फिल्मों ने बाक्स आफिस पर भी अच्छा व्यवसाय किया। जिन प्रमुख फिल्मों के लिए उन्होंने कैमरे की जिम्मेदारी संभाली उनमें ‘पान सिंह तोमर’, ‘न्यूयार्क’, ‘वन्स अपआन ए टाईम इन मुंबई’, ‘बैंड बाजा बारात’, ‘साहेब बीबी और गैंगस्टर’, ‘लेडीज वर्सेस रिकी बहल’, ‘एक था टाईगर’ इत्यादि शामिल हैं।किसी भी फिल्म में कैमरे के महत्व के बारे में असीम ने कहा, ‘‘वैसे तो कैमरे के काम को कहानी के अनुरूप ढालना प्रमुख जिम्मेदारी होती है। कुछ ऐसी फिल्में हैं जिसमें कैमरे का काम तो काफी अच्छा होता है लेकिन वह कहानी के मिजाज से मेल नहीं खाता। वैसे कैमरे का काम फिल्मों के असली स्वरूप को सामने लाने के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है। किसी दृश्य का क्या मूड हो इसके लिए कैमरे की लाइटिंग और उसका लेंस का चयन काफी महत्वपूर्ण होता है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘निर्देशक कैमरे की जुबान से ही दर्शकों को अपनी बात कहता है। संगीत, डायलॉग, खामोशी उसके बाकी रंग और कुची हैं जिससे वह अपनी भाषा को गढ़ता है। ’’ धनबाद में पैदा हुए असीम की आरंभिक पढ़ाई केन्द्रीय विद्यालय धनबाद में हुई जिसके बाद उन्होंने दिल्ली के किरोड़ीमल कालेज से स्नातक करने के बाद मास कम्युनिकेशन रिसर्च सेन्टर, जामिया मिलिया से स्नातकोत्तर की पढ़ाई की। उन्होंने कहा कि जामिया में आने के बाद पूरी दुनिया के रास्ते मेरे सामने खुल गये और वहीं से मेरे अरमानों को पंख मिले जो मुझे अंतत: मुंबई ले आए।एक कैमरामैन के बतौर अलग अलग निर्देशकों के साथ काम करने के अनुभवों के बारे में उन्होंने कहा, ‘‘हर निर्देशक की कहानी कहने का अलग अंदाज होता है, उनके कहानी कहने का ढंग और सौन्दर्यबोध अलग होता है जो अपने आप में एक मजेदार यात्रा होती है। एक कैमरामैन के तौर पर मैं उन्हीं सौन्दर्यबोध को फिल्म के रोल में कैद करने का प्रयास करता हूं।’’ उन्होंने कहा, ‘‘वैसे मैं हर निर्देशक और उनकी कहानी के अलग अलग अंदाज के साथ काम करना चाहता हूं पर निर्देशक के रूप में मेरी खास पसंद तिग्मांशु धूलिया, कबीर खान, मनीष शर्मा, मिलन लुथरा और अरबाज खान हैं। ’’ फुर्सत के क्षणों में अच्छा संगीत सुनने के अलावा पेन्टिंग के साथ साथ ‘स्टिल फोटोग्राफी’ उन्हें बेहद पसंद है।संपादकीय सहयोग : अतनु दास

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