21 Jul 2018, 15:21 HRS IST
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  • बहुत बदल गई है खेलों की दुनिया : प्रवीण
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  • : नेत्रपाल शर्मा : नयी दिल्ली, 26 अगस्त :भाषा: धारावाहिक महाभारत में भीम के किरदार से देशभर में लोकप्रिय हुए फिल्म अभिनेता एवं पूर्व एथलीट प्रवीण कुमार का कहना है कि अब खेलों की दुनिया बहुत बदल गई है।पहले खिलाड़ियों के लिए कोई सुविधा उपलब्ध नहीं थी, लेकिन अब सौभाग्य से उचित प्रशिक्षण के साथ ही तमाम तरह की सुविधाएं मौजूद हैं।वर्ष 1966 और 1970 के एशियाई खेलों में चक्का फेंक में स्वर्ण पदक जीतकर देश का नाम रोशन करने वाले प्रवीण ने यहां ‘भाषा’ के साथ खास बातचीत में कहा कि उनके समय में देश में खेलों की स्थिति काफी खराब थी।खिलाड़ियों के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था तो दूर, बल्कि उनके खाने पीने के लिए भी पर्याप्त राशि की व्यवस्था नहीं हो पाती थी।सीमा सुरक्षाबल :बीएसएफ: के डिप्टी कमांडेंट रह चुके प्रवीण ने 1968 के मेक्सिको ओलंपिक खेलों के दौरान अपने साथ हुए एक वाकये को याद करते हुए बताया कि उस समय ओलंपिक के लिए उनका चयन हुआ, लेकिन बाद में कह दिया गया कि भारत की टीम ओलंपिक में नहीं जाएगी।इस कारण वह अपने गांव चले गए।उन्होंने बताया कि 20 दिन बाद अचानक से उन्हें टेलीग्राम मिला जिसमें उनसे तत्काल दिल्ली पहुंचने को कहा गया और बताया गया कि भारत की टीम ओलंपिक खेलों के लिए मेक्सिको जाएगी।प्रवीण ने कहा कि दो..तीन दिन बाद वह एयर इंडिया के विमान से वाया लंदन मेक्सिको के लिए रवाना हुए और इस दौरान उन्हें कई खराब अनुभवों का सामना करना पड़ा। रास्ते में उन्हें दो तीन दिन तक लंदन में रुकना पड़ा।उन्होंने बताया कि सात..आठ लोगों की टीम के साथ खेल अधिकारी के रूप में गए एमएस गिल ने उन्हें सूचना दी कि एयर इंडिया की ओर से कहा गया है कि खाने..पीने के आधे पैसे वह वहन करेगी और आधे पैसे उन्हें वहन करने होंगे।पूर्व एथलीट ने बताया कि खेल अधिकारी और खिलाड़ियों के पास पैसे नहीं थे, इसलिए उन्हें लंदन में भारतीय समुदाय के एक व्यक्ति के घर रुकना पड़ा।एक कमरे में सात..आठ लोगों को दो..तीन दिन रहना पड़ा और इस दौरान ‘‘हमें खाने को एक..एक, दो..दो रोटी ही मिल पाती थी ।’’ उन्होंने कहा, ‘‘जब हम मेक्सिको पहुंचे तो तब भी परेशानी कम नहीं हुई।कोच दो दिन तक यह पता लगाने में विफल रहे कि अ5यास मैदान कहां है।वह दो दिन तक बस में बैठाकर इधर..उधर घुमाते रहे ।बाद में एक ब्रिटिश एथलीट ने बताया कि अ5यास मैदान तो ओलंपिक मैदान के पीछे ही था।’’ अजरुन पुरस्कार विजेता प्रवीण ने कहा कि ऐसी स्थिति में ओलंपिक जैसे खेलों में पदक पाने की उम्मीद कोई कैसे कर सकता है।प्रवीण ने बताया कि 1966 में किंगस्टन में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान भी उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ा था और खेल अधिकारी उन्हें वहां अकेला छोड़कर आ गए थे।हालांकि, इस दौरान वह तार गोला फेंक प्रतियोगिता में रजत पदक जीतने में सफल रहे थे।उन्होंने कहा कि आज के मुकाबले पहले के खिलाड़ियों में अधिक प्रतिभा थी, लेकिन उचित प्रशिक्षण और पर्याप्त सुविधाएं न मिल पाने के कारण प्रदर्शन उम्मीद के अनुरूप नहीं रहता था।हालांकि, सौभाग्य से अब खिलाड़ियों के लिए खूब सुविधाएं हैं और अब अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धाओं में पदक जीतने वालों के पास पैसे का अंबार लग जाता है।प्रवीण ने कहा कि अजरुन पुरस्कार विजेता खिलाड़ियों को पेंशन के रूप में केवल सात हजार रुपये मिलते हैं जिसे बढ़ाया जाना चाहिए।खिलाड़ी से अभिनेता बने प्रवीण 1974 में तेहरान में आयोजित एशियाई खेलों में भी चक्का फेंक प्रतियोगिता में रजत पदक जीत चुके हैं।संपादकीय सहयोग : अतनु दास

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