19 Aug 2017, 20:27 HRS IST
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  • अच्छी फिल्मों की राह में फिल्म उद्योग ही बाधा: साई कबीर
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    .नयी दिल्ली, 23 अप्रैल : भाषा : इस सप्ताह रिलीज होने जा रही फिल्म ‘रिवॉल्वर रानी’ के निर्देशक साई कबीर का मानना है कि फिल्म उद्योग में अच्छे निर्देशकों, अच्छी कहानियों की एक नई पीढ़ी उभर कर सामने आई है लेकिन इनके और सजग दर्शकों के बीच फिल्म उद्योग खुद एक सबसे बड़ी बाधा बनकर उभरा है जो ‘क्या चलेगी और क्या नहीं चलेगी’ के नाम पर लकीर के फकीर बने रहना चाहता है और प्रयोगों से घबराता है।साई कबीर ने ‘भाषा’ को बताया, ‘‘प्रयोगधर्मी निर्देशकों, कहानियों की एक पूरी नई कतार सामने आ रही है लेकिन सचेत एवं जानकार दर्शकों के साथ संवाद में सबसे बड़ी बाधा बनकर फिल्म उद्योग ही सामने आया है जो किसी भी प्रयोग को इस नाम पर खारिज कर देना चाहता है कि फिल्म उद्योग में फलां चीज को दर्शक पसंद करेंगे फलां को नहीं।वे लीक से हटने से और प्रयोग से घबराते हैं जबकि सच्चाई यह है कि अच्छी फिल्मों को देखने वालों की तादाद धीरे धीरे बढ़ती ही जा रही है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘मैं अपने को भाग्यशाली मानता हूं कि मुझे मेरे हिसाब से ‘वेव सिनेमा’, ‘तिग्मांशु धूलिया’ और ‘मूविंग पिक्चर्स’ जैसे निर्माता मिले।इनमें मैं विशेष रूप से तिग्मांशु जी का शुक्रगुजार हूं जिन्होंने मेरे प्रयोग को खुले दिल से स्वीकारा और फिल्म के साथ आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया।’’ फिल्म ‘रिवॉल्वर रानी’ के बारे में अधिक जानकारी देने से बचते हुए कबीर ने कहा, ‘‘फिल्म एक ब्लैक कॉमेडी है जिसमें एक प्रेम कहानी है। फिल्म का कथानक गैंगस्टर, राजनेता लड़की के इर्द गिर्द घूमता है जिसका एक ‘टॉय ब्वाय’ प्रेमी है जो अपने बॉलीवुड सपने के लिए उस लड़की से जुड़ा होता है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘आधुनिक भारत बेशक बाहर से तड़क भड़क वाला दिखता है मगर अंदर से काफी रग्ण हो गया है और मेरी फिल्म उसी रग्णता पर मनोरंजक तरह से टिप्पणी करती है।’’कबीर ने कहा कि फिल्म का ‘विजुअल ट्रीटमेंट’ :दृश्यांकन: सस्ते साहित्य की तरह से किया गया है और मेरी यह पहली फिल्म सुरेन्द्र मोहन पाठक जैसे सस्ते उपन्यासों को सम्मान के रूप में है। कहानी कहने के सस्ते उपन्यास का ढंग होने के बावजूद यह अंतर्वस्तु में काफी तीखे राजनीतिक व्यंग्य करती है।उन्होंने कहा कि फिल्म की भाषा या कहानी कहने का अंदाज किसी सस्ते उपन्यास ‘मोम की गुड़िया’ या ‘सौ करोड़ का भिखारी’ जैसा है जिसकी विषयवस्तु किसी राजनीतिक फिल्मों की विषय वस्तु से कम नहीं है लेकिन इसके कहने का अंदाज सर्कस जैसा मनोरंजक है।महिला चरित्र प्रधान इस फिल्म के लिए कंगना राणावत के चयन के बारे में पूछने पर कबीर ने कहा, ‘‘कंगना का चुनाव एकदम सही साबित हुआ। फिल्म में जिस तरह के नॉन ग्लैमरस, कुरूप दिखने वाली अभिनेत्री का चरित्र था उसके लिए बॉलीवुड की कोई अभिनेत्री आसानी से तैयार न होती।कंगना ने विगत दिनों में ‘क्वीन’, ‘तनु वेड्स मनु’ इत्यादि जैसी फिल्मों में जिस सफाई से काम किया और इस पुरष प्रधान फिल्म उद्योग में अपने लिए सम्मानजनक जगह बनाई है, वह मेरे चयन को सही साबित करता है।’’ उन्होंने कहा कि कंगना की एक बात वह हमेशा याद करते हैं जिसमें उसने कहा था, ‘‘मैं ऐसी कोई फिल्म नहीं करना चाहती जिसमें हीरो काम करता है, शाम को थका हारा घर आता है, गाना गाता है और अगले दिन फिर काम पर निकल जाता है और अभिनेत्री के पास उसके आसपास मंडराते रहने के अलावा कुछ नहीं करना होता।’’इस नायिका प्रधान फिल्म को चुनने के बारे में कबीर ने कहा, ‘‘एक समय में गुरदत्त साहब, विमल रॉय जैसी बड़ी हस्तियां इस तरह के विषय को चुनने का जोखिम लेती थीं लेकिन विगत 15.20 सालों में इस परंपरा का पतन होता चला गया। हालांकि पिछले कुछ सालों से इस रख में परिवर्तन आ रहा है और महिलाओं के चरित्र को महत्व दिया जाने लगा है।’’ उन्होंने कहा,...

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