17 Aug 2017, 07:21 HRS IST
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  • अंडमान में पर्ल कल्चर की असीम संभावना : डा. सोनकर
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    .राजेश अभय

     नयी दिल्ली, 21 अगस्त : भाषा : दुनिया भर में विख्यात ‘पर्ल कल्चर’ क्षेत्र के वैज्ञानिक डा. अजय सोनकर का मानना है कि अंडमान निकोबार में मोती सृजन :पर्ल कल्चर फार्मिग: के लिहाज से असीम संभावनायें मौजूद हैं तथा आजादी के आंदोलन के समय कभी ‘काला पानी’ की सजा के लिए जाना जाने वाला देश का यह भूभाग अब दुनिया में नायाब काले मोती का निर्माण केन्द्र बन सकता है जो बेहद पर्यावरण अनुकूल परियोजना भी है।डा. सोनकर ने ‘पीटीआई.भाषा’ को बताया, ‘‘अंडमान विविध समुद्री संपदा के मामले में काफी समृद्ध है और बेशकीमती मोतियों को बनाने वाली सीपों की जो प्रजातियां वहां मौजूद हैं वह विश्व के अधिकांश देशों सहित भारत के मुख्य भूमि के किसी भी समुद्री भाग में नहीं पाई जाती हैं।’’ उन्होंने कहा, ‘‘अंडमान का समुद्र इतना धनी है कि यहां के द्वीपों को बहुमूल्य काले और ‘गोल्डन’ मोतियों का प्रमुख उत्पादन व निर्यातक केन्द्र बनाया जा सकता है।अकेले अंडमान की समुद्री संपदा से भारत को अरबों डॉलर की कमाई हो सकती है।’’ डा. सोनकर ने अंडमान में अपने निजी शोध के द्वारा विश्व की आधुनिकतम तकनीक विकसित की, जिसके उपयोग से विश्व का सबसे बहुमूल्य मोती बनाया जा सकता है।इसके अलावा उन्होंने मोती निर्माण की प्रक्रिया में होने वाली सीपों की मृत्यु पर पूरी तरह काबू पा लिया।पर्ल फार्मिग में अगुवा देश, जापान जैसे देश में भी मोती निर्माण की प्रक्रिया में 60 से 70 प्रतिशत सीपों की मृत्यु हो जाती है।डॉ सोनकर को उनकी विशिष्ट तकनीक के लिए कई देशों में आमंत्रित किया जाता रहा है।इसी कड़ी में हाल ही में ब्राजील के यूनिवर्सिटी ऑफ वेल तथा सेन्टर फॉर टेक्नीकल साइंसेज ऑफ लैंड एंड सी के प्रोफेसरों ने डॉ सोनकर से मोती उत्पादन के लिए तकनीकी सहायता मांगी है। डॉ सोनकर को अक्तूबर माह में ब्राजील में आयोजित नेशनल ओशियनोग्राफिक कांग्रेस में व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया गया है।डा. सोनकर ने कहा, ‘‘भारत की जलवायु और यहां उपलब्ध सीपों की विशेष प्रजातियों के कारण भारत मोती उत्पादन में दुनिया का अग्रणी देश बन सकता है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘मोती के बनने में अन्य देशों की जलवायु स्थिति में एक से तीन वर्ष का समय लगता है, लेकिन अपने देश में यह छह से आठ महीने में तैयार हो जाता है। पर्ल फार्मिग की परियोजना पूर्णतया मानवश्रम आधारित होने के कारण यहां भारी मात्रा में लोगों को रोजगार भी मिल सकता है।’ उल्लेखनीय है कि डा. सोनकर ने दुनिया के सबसे बड़े आकार :22 मिमी: के न्यूक्लियस के जरिये काला मोती बनाया था जो दुनिया में अब तक के सबसे बड़े आकार का मोती है। उनके शोध कार्य के लिए पूर्व राष्ट्रपति ए पी जे अब्दुल कलाम ने विशेष तौर पर उन्हें बधाई दी थी और काले मोती के उत्पादन को बड़ी उपलब्धि बताया था।इसके अलावा उन्होंने मीठे पानी के सीपों में न्यूक्लियस के साथ मोती बनाकर एक असंभव कार्य को संभव बनाया था, जिसके बाद अमेरिका के हवाई द्वीप में उन्हें बतौर राजकीय अतिथि पहले ‘वर्ल्ड एक्वाकल्चर’ सम्मेलन में आमंत्रित किया गया था।उन्होंने कहा, ‘‘बहुत कम लोगों को ज्ञात है कि कोई भी सीप ‘फिल्टर फीडर’ होता है यानी पानी से अपना भोजन लेने की प्रक्रिया में कोई एक सीप 96 लीटर पानी को बैक्टेरिया मुक्त कर सकता है। सीप पानी में गंदलेपन को दूर करता है, पानी में नाइट्रोजन की मात्रा कम कर देता है, ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ा देता है और पानी को प्रदूषणमुक्त करने के अलावा प्रदूषण के कारकों को भी हमेशा के लिए खत्म कर देता है।’’ डा. सोनकर ने कहा, ‘‘पर्ल फार्मिग एक पर्यावरण अनुकूल परियोजना भी है क्योंकि सीप ही अकेला जीव है जो पानी को साफ रखता है।’’ नदियों की सफाई में सीप के उपयोग की अहम भूमिका को रेखांकित करते हुए डा. सोनकर ने कहा, ‘‘समुद्र की तरह मीठे पानी में भी बाई.वाल्व :सीप: होते हैं और इनकी पानी की सफाई में अहम भूमिका हो सकती है। कहीं भी सीप भारी संख्या में होते हैं और जब एक सीप...

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