27 Jun 2019, 04:15 HRS IST
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  • स्वच्छ भारत के विषय पर बहुत पहले लिख ली थी कहानी, अब आ रही है फिल्म 

                                         :वैभव माहेश्वरी:

    नयी दिल्ली, छह अगस्त :भाषा: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लाल किले की प्राचीर से देश को खुले में शौच के चलन से मुक्त करने और स्वच्छ भारत का आह्वान करने से कुछ महीने पहले ही एक युवक गांवों और झुग्गी बस्तियों में महिलाओं के सामने आने वाली इस समस्या पर फिल्म की कहानी लिखकर उसे परदे पर उतारने की कल्पना कर चुका था।
    यूं तो यह संयोग है कि जब मनोज मैरता ने दिल्ली की झुग्गी बस्तियों में इस समस्या को देखा तो उन्होंने अपनी कल्पनाशीलता और फिल्म लेखक की समझ से "माई डियर प्राइम मिनिस्टर" शीर्षक के साथ एक ऐसी पटकथा लिखी जिसमे इस विषय को संवेदनशीलता के साथ साथ मनोरंजक तरीके से उकेरा गया। उनकी कहानी में एक बच्चा अपनी विधवा मां के लिए टॉयलेट बनाने के लिए संघर्ष करता है। यह महज़ इत्तेफाक है कि उसी दौरान देश मे नयी सरकार आने के बाद स्वच्छ भारत अभियान का बिगुल बजा।
    मनोज की इस कहानी को जानेमाने निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने 'मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर’ नाम से बनाया है मेहरा जल्द ही फिल्म के रिलीज़ की घोषणा करेंगे।
    बिहार के सुपौल से दिल्ली आकर पत्रकारिता की पढ़ाई करने वाले और बाद में मुंबई जाकर कई साल तक फिल्म लेखन के क्षेत्र में संघर्ष करने वाले मनोज ने ‘भाषा’ से बातचीत में कहा कि यह सुखद संयोग ही था कि जब प्रधानमंत्री मोदी ने देश को खुले में शौच के अभिशाप से मुक्त करने के लिए संदेश दिया तभी वह कुछ फिल्मकारों को अपनी कहानी भेजकर फिल्म बनाने की संभावनाएं तलाश रहे थे।
    मनोज ने बताया कि इसी दौरान ‘रंग दे बसंती’ और ‘भाग मिल्खा भाग’ जैसी सफल फिल्में बना चुके मेहरा ने यह स्क्रिप्ट सुनी तो यह उनके दिल को छू गई। फिल्म की शूटिंग पूरी हो चुकी है।
    मनोज के मुताबिक फिल्म इतनी रियलस्टिक है कि इसमें किरदार निभा रहे कुछ बाल कलाकार झुग्गियों के ही रहने वाले बच्चे हैं।
    वह कहते हैं कि एक तरफ भारत विकास की ऊंची छलांग लगाने के लिए कमर कस रहा है मगर दूसरी तरफ एक बड़ी आबादी आज भी खुले में शौच को मजबूर है।
    उन्होंने कहा कि यूं तो यह बहुत साधारण सा विषय लगता है लेकिन देश में स्वच्छ भारत की जागरुकता के बीच बहुत सामयिक हो गया है। इस कहानी को मां-बेटे के भावनात्मक रिश्ते में पिरोकर बनाना इसे और अधिक प्रभावशाली बना देता है।
    मनोज ने कहा कि देशभर में इस विषय पर फैल रही जागरूकता ने एक तरह से उनकी लिखी फिल्म को परदे पर लाने में आसान बना दिया क्योंकि अब सभी लोग जानने समझने लगे हैं कि अपने घर के अलावा आसपास के परिवेश में फैल रही गंदगी के लिए कहीं न कहीं हम सभी समान रूप से जिम्मेदार हैं और हमारे चारों और सफाई बनाये रखना हमारी जिम्मेदारी है।
    बतौर लेखक मनोज की यह पहली फिल्म है, ऐसे में वह अपनी कल्पना को फिल्म का रूप देने में कितना सफल हुए, इस बारे में पूछने पर उन्होंने कहा कि वह अपनी स्क्रिप्ट पर करीब पांच साल से काम कर रहे थे, और उन्हें बहुत खुशी हुई जब उनकी यह कहानी अंततोगत्वा वैसी की वैसी बनी है जैसी उन्होंने लिखी थी, जिस तरह के उन्होंने किरदार लिये थे और जिस तरह का परिवेश रचा था। दरअसल झुग्गी कहीं की भी हो चाहे वो मुम्बई हो, दिल्ली हो या फिर कोई भी बड़ा शहर, उनकी समस्याएं सभी जगह एक सी ही हैं।
    भविष्य में वह शिक्षा के विषय पर अपनी लिखी पटकथा का निर्देशन खुद करना चाहते हैं। उन्होंने महात्मा गांधी के विचारों पर आधारित बच्चों के लिए भी एक फिल्म लिखी है। वह एक गुजरे जमाने के सुपरस्टार पर अमिताभ बच्चन को लेकर फिल्म बनाना चाहते हैं। एड्स के ऊपर भी वह एक कहानी लिख चुके हैं।
    वर्तमान में फिल्म लेखन की चुनौतियों पर अपने अनुभव साझा करते हुए मनोज ने कहा कि भारतीय सिनेमा में लेखक आज भी पहचान की लड़ाई लड़ रहे है।

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