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  • हिन्दी के विकास के लिए अब कंप्यूटर साक्षरता जरूरी : विशेषज्ञ

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पीटीआई-भाषा संवाददाता 14:1 HRS IST

नयी दिल्ली, 14 सितंबर (भाषा) सोशल मीडिया में हिन्दी के बढ़ते प्रचलन ने भाषा के विकास के लिए संभावनाओं के नये द्वार खोले हैं तथा विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में हिन्दी का विकास इस बात पर निर्भर करेगा कि उस भाषा में कितने लोग कंप्यूटर जानते हैं।

कुछ विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि हिन्दी में सोशल मीडिया में एक रोचक प्रवृत्ति दिखा ।फेसबुक और ट्विटर पर आम हिन्दी भाषी बड़ी संख्या में पहले आ गये जबकि लेखकों, कवियों, कहानीकारों आदि रचनाकारों का आभासीय जगत में आना अपेक्षाकृत बाद में हुआ और यह सिलसिला अभी भी पूरी तरह से गति नहीं पकड़ पाया है।

ब्लागिंग तथा अन्य सोशल मीडिया पर काफी समय से सक्रिय कलकत्ता विश्विवद्यालय में हिन्दी के पूर्व प्राध्यापक जगदीश्वर चतुर्वेदी ने भाषा से बातचीत में कहा कि भविष्य में हिन्दी सहित किसी भी भाषा के लिए कंप्यूटर साक्षरता बहुत जरूरी है। लोग कंप्यूटर के माध्यम से अपने विचारों, भावनाओं और रचनात्मकताओं को खुलकर अभिव्यक्त कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया में आने के बाद हिन्दी का लेखन बढ़ गया है। लोग यदि देवनागरी में लिखने में कठिनाई महसूस कर रहे हैं तो वे रोमन में लिख रहे हैं। किन्तु सोशल मीडिया की एक समस्या भी है। इसमें भाषा का प्रसार तो हो रहा है किन्तु भाषा को लेकर लोगों के ज्ञान और भाषा के प्रति समझदारी में विस्तार नहीं हो रहा। आप गलत शब्द लिखते हैं तो कंप्यूटर या मोबाइल उसे अपने आप ठीक कर देता है। पहले व्यक्ति शब्दकोश देखता था। भाषा लिखने के प्रति सतर्क रहता था। यह हिन्दी हीं नहीं अंग्रेजी के साथ भी हो रहा है।

चतुर्वेदी इस बात को नहीं मानते कि सोशल मीडिया पर लिखने से रचनात्मक लेखन पर असर पड़ता है। यदि आपको कंप्यूटर पर लिखना आता है तो आपके लेखन का गुण और मात्रा दोनों कई गुना बढ़ गया है। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर अति सक्रिय होने के बावजूद उनकी पिछले कुछ सालों में कई कहानियां आयी हैं।

उनका मानना है कि साहित्यकारों को अपनी रचनाएं इंटरनेट पर अधिक से अधिक रखनी चाहिए क्योंकि इसमें पाठकों का एक विशाल वर्ग है। आपको पत्र-पत्रिकाओं, पुस्तकों में लिखने से कोई नहीं रोक रहा। लेकिन यहां आपके पास रियल टाइम में पाठक मौजूद है। साथ ही बड़ी संख्या में ऐसे पाठक हैं जो साहित्य प्राय: नहीं पढ़ते। वह आपसे जुड़ सकते हैं। यहां लिखने में फायदा ज्यादा है, नुकसान कोई नहीं है।

हिन्दी में एक अनूठे कोश ‘‘शब्दों का सफर’’ के लेखक अजित वडनेरकर ने बताया कि वह सोशल मीडिया पर आज से दस साल पहले से ब्लागिंग का दौर से देख रहे हैं। इसे देखकर कहा जा सकता है कि हिन्दी किसी भी लिहाज से खतरे में नहीं है। कोई खतरा नहीं है।

उन्होंने कहा, ‘‘सोशल मीडिया आने के बाद सबसे अच्छी बात यह हुई है कि जिस आम आदमी को साहित्य बहुत दूर की चीज लगती थी तथा खुद के लिखे शब्दों को मुद्रित रूप में देखने की खुशी होती थी, उसे वह सब यहां मिला। अपने छपे हुए को देखने से हिन्दी भाषी लोगों का आत्मविश्वास बहुत बढ़ जाता है।’’ वडनेरकर ने कहा कि यदि सोशल मीडिया न होता तो आज हिन्दी वहीं होती जहां तथाकथित हिन्दी सेवी उसे देखना चाहते थे। सोशल मीडिया ने हिन्दी को संभाला है, इसमें दो राय नहीं और हिन्दी की ताकत उभरकर आयी है।

उन्होंने इस बात को माना कि तकनीकी ज्ञान से भाषा के विस्तार को सहायता मिलती है। पर हिन्दी में एक ओैर अलग बात देखने को मिली। अमूमन जिन्हें मध्यम वर्ग और निचला तबका माना जाता था, उस वर्ग के लोगों ने हिन्दी के अधिकतर साहित्यकारों-लेखकों की तुलना में बहुत पहले ही सोशल मीडिया पर लिखना शुरू कर दिया।

वडनेरकर ने कहा, ‘‘हिन्दी साहित्यकारों के शुद्धतावाद और आभिजात्य ने उन्हें सोशल मीडिया पर आने से रोके रखा। किन्तु अब तस्वीर बदल रही है। अब हम और आप भी अपने विचारों और भावनाओं को उस भाषा में अभिव्यक्त कर रहे हैं जिसे वे साहित्यिक भाषा मानते हैं। इसलिए देर-सबेर उन्हें यहां आना पड़ेगा।’’ ‘‘कविता कोश’’ वेबसाइट के संस्थापक ललित कुमार का कहना है कि निश्चित तौर किसी भी भाषा को समसामायिक परिवेश के अनुरूप काम करना पड़ता है। कंप्यूटर आज के युग की आवश्यकता है। इसलिए हिन्दी में कंप्यूटर ज्ञान से निश्चित तौर पर मदद मिलती है।

ललित का कहना है कि सोशल मीडिया ऐसा मंच है जिस पर लिखकर कई युवा लेखक बन गये। किन्तु कई प्रतिष्ठित लेखक आज तक संभवत: अपनी मानसिक उलझन के कारण इस मंच पर नहीं आ पा रहे हैं। उन्हें इस माध्यम पर अभी तक सहजता महसूस नहीं हो रही।

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