शोषण की औपनिवेशिक भावना खनिज संपन्न झारखंड और ओडिशा के खदानों में अब भी जारी:अमिताव घोष

तिरुवनंतपुरम, दो फरवरी (भाषा) मशहूर लेखक और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित अमिताव घोष ने बृहस्पतिवार को कहा कि शोषणकारी अर्थशास्त्र पिछली कुछ शताब्दियों में दुनिया भर में उपनिवेशवाद की पहचान था और यही अर्थव्यवस्था खनिज संपन्न झारखंड और ओडिशा की खानों में अब भी शासन कर रहा है।.घोष ने अपनी पुस्तक ‘द नटमेग कर्स’ की पृष्ठभूमि प्रस्तुत करते हुए कहा कि जायफल के व्यापार को नियंत्रित करने के लिए 1621 में बांदा द्वीप समूह के मूल निवासियों का नरसंहार किया गया था। यह व्यापार, बाद में लोगों की गुलामी का कारण बना और कई लोगों को बांदा में जायफल के बागानों में काम करने के लिए दक्षिण भारत से ले जाया गया। भाषा.

टैगोर से प्रभावित एस्तोनियाई लेखिका डोरिस करेवा के लिए भारत एक ‘एडवेंचर’ है

जयपुर, 29 जनवरी (भाषा) ‘एस्तोनियन आर्डर आफ दी व्हाइट स्टार’ पुरस्कार से एस्तोनिया सरकार द्वारा 2001 में सम्मानित कवयित्री डोरिस करेवा भारतीय संस्कृति से इस कदर प्रभावित हैं कि उन्हें यह किसी जादुई दुनिया जैसा लगता है। डोरिस किशोरावस्था से ही गुरूदेव रविन्द्र नाथ टगौर की कविताओं से काफी प्रभावित रहीं हैं और बचपन से ही वह भारत आने के सपने देखा करती थीं। . जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में भाग लेने के लिए पिछले दिनों भारत आईं डोरिस करेवा ने ‘भाषा’ को दिए एक विशेष साक्षात्कार में कहा, ‘‘मैं चार बार भारत आ चुकी हूं। 2013 में या शायद उससे भी पहले। इतने समय में आए बदलाव के बारे में बताना मुश्किल है क्योंकि इंडिया केवल एक देश नहीं है बल्कि एक महाद्वीप है। यह इतना रहस्यमय है, हर बार जब भी मैं आती हूं तो विभिन्न हिस्सों में जाती हूं... विभिन्न किस्म के लोगों से मिलती हूं ...और मेरे लिए यह एक कभी न खत्म होने वाला एडवेंचर है।’’. उन्होंने शांति निकेतन का भी दौरा किया है जहां उन्होंने एक अनुवाद सेमीनार में भाग लिया था। डोरिस बताती हैं, ‘‘एस्तोनियाई भाषा में टगौर की कविताओं का अनुवाद हुआ है। उनकी शैली इतनी सम्मोहक है कि सौंदर्य अपने एक नए रूप में सामने आता है। उसे बहुत रोचक बना देता है। ये कविताएं किसी नृत्य या गीत की तरह हैं।’’. कबीर के दोहों का एस्तोनियाई भाषा में अनुवाद करने वाली डोरिस कहती हैं कि सूफी परंपरा और रहस्यवाद ने उन्हें बहुत प्रभावित किया है। समकालीन भारतीय कवियों में वह तेजी ग्रोवर और रूस्तम सिंह की कविताओं को पसंद करती हैं। उनके साथ उनकी करीबी दोस्ती है और उनकी कविताओं का भी उन्होंने अनुवाद किया है।. उनकी रचनाओं का दुनिया की 20 से अधिक भाषा में अनुवाद किया गया है और अपनी संगीतात्मकता के कारण एस्तोनिया के साथ ही विदेशों में उन्हें संगीत रचनाओं में ढाला गया और वह काफी लोकप्रिय हुईं । . उन्होंने अन्य लेखकों के अलावा शेक्सपियर, ऐमिली डिकनसन, अन्ना अखमातोवा, जोसेफ ब्रोडस्की, कबीर, खलील जिब्रान और सैम्युअल बैकेट की रचनाओं का एस्तोनियाई भाषा में अनुवाद किया है। . एक सवाल के जवाब में डोरिस कहती हैं, ‘‘ एस्तोनिया दस लाख की आबादी वाला देश है। हमारी पहचान बहुत ही मजबूती के साथ हमारी भाषा से जुड़ी हुई है। एस्तोनियाई भाषा की जड़ें बहुत गहरी हैं जो कि मूल जातीय लोगों की भाषा है। हमें अपने संगीत पर, अपनी संस्कृति की विशिष्टता पर गर्व है और कविता हमारी भाषा का सार तत्व है।’’. एस्तोनिया की पूर्वी सीमा रूस के साथ लगती है और ऐसे में उनके देश पर यूक्रेन युद्ध के प्रभाव के बारे में पूछे जाने पर डोरिस कहती हैं, ‘‘लोग अपनी तरफ से मदद कर रहे हैं । हम किताबें भेज रहे हैं । लोग एस्तोनियाई भाषा के साहित्य का अनुवाद यूक्रेनी भाषा में कर रहे हैं ताकि शरणार्थी शिविरों में रह रहे बच्चों को पढ़ाया जा सके। महिलाएं सैनिकों के लिए कपड़े सिल रही हैं, गर्म कपड़े भेज रही हैं। समाज के हर स्तर पर बहुत कुछ किया जा रहा है। सरकार के साथ ही जनता भी हर संभव मदद कर रही हैं ।’’ . भाषा .

पोम्पिओ ने अपनी किताब में कहा, सुषमा ‘अहम’ नहीं थी लेकिन जयशंकर से फौरन दोस्ती हो गई

वाशिंगटन 24 जनवरी (भाषा) अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ ने कहा है कि उन्होंने अपनी भारतीय समकक्ष सुषमा स्वराज को कभी "महत्वपूर्ण राजनीतिक शख्सियत " के रूप में नहीं देखा लेकिन विदेश मंत्री एस जयशंकर से पहली मुलाकात में ही अच्छे मित्रवत रिश्ते बन गए थे।. अपनी नई किताब ‘नेवर गिव एन इंच: फाइटिंग फॉर अमेरिका आई लव’ में पोम्पिओ ने सुषमा स्वराज को उपहास जनक शब्दों में वर्णित किया है और उनके बारे में आम भाषा के उपहासजनक शब्द जैसे नासमझ आदि का भी प्रयोग किया है। यह किताब मंगलवार को बाज़ार में आई है।. उन्होंने कहा, “मेरे दूसरे भारतीय समकक्ष सुब्रह्मण्यम जयशंकर थे। मई 2019 में, हमने "जे" का भारत के नए विदेश मंत्री के रूप में स्वागत किया। मैं इससे बेहतर समकक्ष के लिए नहीं कह सकता था। मैं इस व्यक्ति को पसंद करता हूं। अंग्रेजी उन सात भाषाओं में से एक है जो वह बोलते हैं और वह मेरे से बेहतर हैं।” पोम्पिओ 2024 के राष्ट्रपति चुनाव लड़ने की संभावना तलाश रहे हैं। . पोम्पिओ ने जयशंकर को “ पेशेवर, तार्किक और अपने बॉस तथा अपने देश के बड़े रक्षक’ के तौर पर वर्णित किया है। उन्होंने कहा, “ हम फौरन दोस्त बन गए। हमारी पहली मुलाकात में मैं बहुत ही कूटनीतिक भाषा में शिकायत कर रहा था कि उनकी पूर्ववर्ती विशेष रूप से मददगार नहीं थी।”. पोम्पिओ के दावों पर टिप्पणी करते हुए जयशंकर ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ''मैंने मंत्री पोम्पिओ की किताब में श्रीमती सुषमा स्वराज जी का जिक्र करने वाला एक अंश देखा है। मैंने हमेशा उनका बहुत सम्मान किया और उनके साथ मेरे बेहद करीबी और मधुर संबंध थे। मैं उनके लिए इस्तेमाल की जाने वाली अपमानजनक शब्दावली की निंदा करता हूं।". उन्होंने कहा, “ हम स्वाभाविक सहयोगी हैं, क्योंकि हम लोकतंत्र, आम भाषा तथा लोगों और प्रौद्योगिकी के संबंधों का इतिहास साझा करते हैं। भारत अमेरिकी बौद्धिक संपदा और उत्पादों की भारी मांग वाला बाजार भी है। इन कारकों के साथ ही दक्षिण एशिया में इसकी रणनीतिक स्थिति की वजह से मैंने चीनी आक्रामकता का मुकाबला करने के लिए भारत को अपनी कूटनीति का आधार बनाया।” भाषा.

भाषा की सरहदें सख्त नहीं होनी चाहिए : गीतांजलि श्री

जयपुर, 21 जनवरी (भाषा) किसी भी भाषा की समृद्धि के लिए उसमें लोच और रवानगी को महतवपूर्ण बताते हुए ''रेत समाधि'' की लेखिका एवं बुकर पुरस्कार विजेता गीतांजलि श्री ने यहां शनिवार को जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (जेएलएफ) में कहा कि भाषा की सरहदें सख्त नहीं होनी चाहिए।. गीतांजलि श्री ने कहा कि भाषा के शुद्धिकरण के चक्कर में लोग भूल जाते हैं कि भाषा में जितना लचीलापन, जितनी गति और रवानी रहेगी, भाषा उतनी ही समृद्ध होगी।. उन्होंने भाषा में नए प्रयोगों और रूढ़िवादी परपंराओं को तोड़ने की भी हिमायत की।. गीतांजलि श्री का उपन्यास ‘रेत समाधि’ स्वयं कथा कहन की एक अलग परंपरा के साथ लिखा गया है, जिसमें भाषाई स्तर पर एक नया ढांचा और नया शिल्प गढ़ा गया है।. उन्होंने कहा, ''भाषा को शुद्ध करने के प्रयासों में जुटे लोग भाषा को संकुचित कर रहे हैं। हिंदी का मस्त मलंग तेवर है, इसे शुद्ध करने की कवायद, इस भाषा को संकीर्ण करना है, जो एक प्रकार की बीमारी है।”. गीतांजलि श्री का कहना है कि लेखक और आम जनता का रिश्ता भाषा की व्याकरण से नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति से होता है।. ''टोकरी में दिगंत'' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित अनामिका ने इंद्रजाल (इंटरनेट) के जमाने की हिंदी पर कहा कि इस नए चलन ने भाषायी पदानुक्रम को तोड़ा है और एक प्रकार की भाषायी खिचड़ी पकाई है।. इसी कड़ी में गीतांजलि श्री ने कहा कि इंटरनेट के दौर में हिंदी भाषा के बर्ताव में एक किस्म का फौरीपना है, जिसे लेकर सचेत होने की जरूरत है कि कहीं इससे भाषाई लज्जत न बिगड़ जाए।. भाषा.